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'हिंदुत्व' हरा कभी लाल ,कभी भगवा लहरा रहा है, मेरा देश शायद हिंदुत्व की ओर जा रहा है। मुझे पार्टी विशेष से जोडा जा रहा है, सिर्फ एक रंग के झंडे में मोड़ा जा रहा है। मैं धर्म नहीं संस्कृति का वाहक हूं, मैं व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व का शावक हूं। मैं शब्द नहीं मानवता का अर्थ हूं, मैं खून नहीं अहिंसा की शर्त हूं। मैं तम नहीं, मैं प्रकाश हूं स्वीकारोक्ति का आकाश हूं । मैं न जाति हूं, न धर्म हूं, मैं गीता हूं , मैं कर्म हूं। मैं वीर सावरकर की किताब हूँ, मैं विवेकानंद रूपी आफताब हूं। मैं Visit site »